नागरिकों और गैर-नागरिकों को उपलब्ध मौलिक अधिकार
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सांविधानिक विधि

नागरिकों और गैर-नागरिकों को उपलब्ध मौलिक अधिकार

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 21-Jun-2024

परिचय:

भारत का संविधान, 1950, भारत के राज्यक्षेत्र में सभी व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वाधीनता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिये मौलिक अधिकारों को प्रदान करता है।

  • मौलिक अधिकार भारतीय संविधान के भाग III में अनुच्छेद 12 से 35 तक निहित हैं।
  • कुछ मौलिक अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को प्राप्त हैं।
  • मौलिक अधिकारों का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की गरिमा को बनाए रखना तथा राज्य द्वारा आक्रमण के विरुद्ध व्यक्तियों की स्वतंत्रता की रक्षा करना है।

मौलिक अधिकार:

  • मौलिक अधिकार, भारतीय संविधान, 1950 के भाग III में निहित हैं।
  • मुख्य स्तर पर मूल अधिकारों की पर छह श्रेणियाँ हैं, और वे इस प्रकार हैं:
    • समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
    • स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
    • शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)
    • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
    • सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
    • संवैधानिक उपचार का अधिकार (अनुच्छेद 32)
  • भारतीय संविधान में संपत्ति का अधिकार भी एक मौलिक अधिकार था, जिसे 44वें संविधान संशोधन द्वारा हटा दिया गया।
  • इनमें से कुछ अधिकार केवल भारत के नागरिकों को ही उपलब्ध हैं, जबकि कुछ गैर-नागरिकों को भी उपलब्ध हैं।

सभी व्यक्तियों को उपलब्ध मौलिक अधिकार (गैर-नागरिकों सहित):

  • विधि के समक्ष समता एवं विधियों का समान संरक्षण (अनुच्छेद 14):
    • अनुच्छेद 14 यह सुनिश्चित करता है कि राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता या विधि के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
    • यह प्रावधान नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों पर लागू होता है तथा गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार की गारंटी देता है।
  • अपराधों के लिये दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद 20):
    • अनुच्छेद 20 पूर्वव्यापी विधियों, दोहरे परिसंकट एवं आत्म-दोष के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है।
    • ये सुरक्षा सभी व्यक्तियों को उपलब्ध है, चाहे उनकी नागरिकता कुछ भी हो।
  • जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण (अनुच्छेद 21):
    • अनुच्छेद 21 भारतीय संविधान के अंतर्गत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अधिकारों में से एक है, जिसमें कहा गया है कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही किसी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जाएगा।
    • यह अधिकार गैर-नागरिकों सहित सभी व्यक्तियों को उपलब्ध है।
  • प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21-A):
    • अनुच्छेद 21-A, 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा सम्मिलित किया गया।
    • इस अनुच्छेद का मुख्य उद्देश्य छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना है।
  • गिरफ्तारी और निरुद्धि से संरक्षण (अनुच्छेद 22):
    • अनुच्छेद 22 मनमाने ढंग से गिरफ्तारी और निरुद्धि के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करता है, तथा यह सुनिश्चित करता है कि व्यक्तियों को उनकी गिरफ्तारी के आधारों के विषय में सूचित किये जाने का अधिकार है तथा उन्हें विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार है।
    • यह अधिकार गैर-नागरिकों सहित सभी व्यक्तियों पर लागू होता है।
  • मानव दुर्व्यापार एवं बलात् श्रम का प्रतिषेध (अनुच्छेद 23):
    • अनुच्छेद 23 मानव तस्करी, बलात् श्रम तथा किसी अन्य समान प्रकार के बलात श्रम पर प्रतिबंध लगाता है।
    • यह अधिकार नागरिकों एवं गैर-नागरिकों दोनों को उपलब्ध है।
  • कारखानों आदि में बालकों के नियोजन पर प्रतिषेध (अनुच्छेद 24):
    • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24 के अंतर्गत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी कारखाने, खदान या अन्य खतरनाक गतिविधियों में नियोजित करना प्रतिबंधित है।
  • अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म की अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25):
    • अनुच्छेद 25 सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने के अधिकार को सुनिश्चित करता है।
    • यह अधिकार नागरिकों एवं गैर-नागरिकों दोनों को उपलब्ध है।
  • धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 26):
    • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता देता है और यह धर्म की सामूहिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
  • धर्म की अभिवृद्धि के लिये करों के भुगतान से स्वतंत्रता (अनुच्छेद 27):
    • अनुच्छेद 27 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को किसी धार्मिक सम्प्रदाय के प्रचार या रखरखाव के लिये कोई कर देने के लिये बाध्य नहीं किया जाएगा।
  • कुछ शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या पूजा में भाग लेने से स्वतंत्रता (अनुच्छेद 28):
    • अनुच्छेद 28 राज्य के धन से संचालित किसी भी शैक्षणिक संस्थान में धार्मिक शिक्षा प्रदान करने पर प्रतिबंध लगाता है।

केवल नागरिकों के लिये उपलब्ध मौलिक अधिकार:

  • धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15):
    • अनुच्छेद 15 विशेष रूप से भारत के किसी भी नागरिक के विरुद्ध धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है।
  • लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता (अनुच्छेद 16):
    • अनुच्छेद 16 लोक नियोजन के विषयों में भारतीय नागरिकों के लिये अवसर की समता से संबंधित है।
    • इसमें कहा गया है कि भारत के किसी भी नागरिक के साथ राज्य के अधीन किसी भी नियोजन के लिये धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि से संबंधित अधिकारों का संरक्षण (अनुच्छेद 19):
    • अनुच्छेद 19 छह अधिकारों को सुनिश्चित करता है जो विशेष रूप से नागरिकों को उपलब्ध हैं, जिनमें शामिल हैं:
      • भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
      • शांतिपूर्वक और बिना आयुध के एकत्र होना
      • संघ या सहकारी समितियाँ बनाना
      • भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार
      • भारत के किसी भी भाग में निवास करना और बसना
      • कोई भी पेशा अपनाना या कोई व्यवसाय, व्यापार या कारोबार करना।
  • अल्पसंख्यकों की भाषा, लिपि और संस्कृति का संरक्षण (अनुच्छेद 29):
    • अनुच्छेद 29 अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है तथा नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने की अनुमति देता है।
  • अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार (अनुच्छेद 30):
    • अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने तथा उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है।

निष्कर्ष:

भारतीय संविधान नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को मौलिक अधिकारों की एक शृंखला प्रदान करता है, जो विधि के शासन के प्रति इसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। जबकि कुछ अधिकार राष्ट्रीय हितों एवं सार्वजनिक कल्याण की रक्षा के लिये विशेष रूप से नागरिकों के लिये आरक्षित हैं, संविधान यह सुनिश्चित करता है कि गैर-नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाए। सभी व्यक्तियों को मौलिक अधिकारों की उपलब्धता, चाहे उनकी नागरिकता कुछ भी हो, न्याय, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के प्रति भारत के समर्पण को रेखांकित करती है।