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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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सिविल कानून

सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20 के अधीन शास्ति

 23-Mar-2026

शैलेश कुमार यादव आई.पी.एस. बनाम भारत संघ एवं अन्य 

"इन अधिकारिता संबंधी तथ्यों में से किसी एक का अस्तित्व शास्ति अधिरोपित करने के लिये एक अनिवार्य शर्त है।" 

न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की पीठ नेशैलेश कुमार यादव आई.पी.एस. बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामलेमें निर्णय दिया कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 के अधीन शास्ति केवल तभी अधिरोपित की जा सकती है जब मांगी गई जानकारी प्रदान करने में जानबूझकर बाधा या विलंब किया गया हो। 

  • न्यायालय ने केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा पारित शास्ति आदेशों को रद्द कर दियायह मानते हुए कि वे मनमानेसोचे-समझे और पूर्वाग्रह तथा पूर्व-निर्णय से दूषित थेजिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ। 

शैलेश कुमार यादव आई.पी.एस. बनाम भारत संघ और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • एक आवेदक ने सूचना के अधिकार अधिनियम के अधीन डुप्लिकेट पासपोर्टजमा करने के प्रपत्रप्रक्रिया और लागू समय सीमा के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिये एक अनुरोध दायर किया। 
  • गाजियाबाद में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी (RPO) और लोक सूचना अधिकारी (PIO) के पद पर तैनात याचिकाकर्त्ता को फाइल प्राप्त हुई। 
  • आवेदन को शुरू में इसलिये वापस कर दिया गया था क्योंकि प्रस्तुत डिमांड ड्राफ्ट गलत नाम पर था। 
  • सुधार और पुनः प्रस्तुत करने के बादयाचिकाकर्त्ता ने आवेदक से "कुंजी संख्या" और "फ़ाइल संख्या" मांगीजिसके बिना संबंधित वेबसाइट संचालित नहीं की जा सकती थी। 
  • सूचना प्राप्त न होने से व्यथित होकर आवेदक ने सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 18 के अधीन परिवाद दर्ज कराया 
  • केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने याचिकाकर्त्ता को दोषी ठहराते हुए दो आदेश पारित कियेएक जांच शुरू की और उस पर अधिकतम 25,000 रुपए का आर्थिक शास्ति अधिरोपित की 
  • याचिकाकर्त्ता ने इन आदेशों को इस आधार पर चुनौती दी कि ये पूर्व नियोजित थे और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने शास्ति की सिफारिश करने से पूर्व मुख्य पासपोर्ट अधिकारी की जांच रिपोर्ट का इंतजार नहीं किया था। 
  • उन्होंने अभिवचन किया कि गाजियाबाद स्थित क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय में कर्मचारियों की कमी और काम के लंबित होने के कारण ही विलंब हुआ है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

धारा 20 के दायरे पर: 

  • न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि धारा 20 के अधीन शास्ति प्रत्येक विलंब या कमी पर लागू नहीं होती है। 
  • शास्ति अधिरोपित करने से पहले आयोग को पहले यह स्पष्ट राय बनानी होगी कि सूचीबद्ध अधिकारिता संबंधी तथ्यों में से कोई एक विद्यमान है - जैसे कि दुर्भावनापूर्ण कदाचारजानबूझकर बाधा डालनाया अनुचित इंकार करना। 

आयोग के कर्त्तव्य पर: 

  • न्यायालय ने माना कि यद्यपि कर्तव्यनिष्ठा से निर्वहन साबित करने का भार लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर हैलेकिन इससे आयोग अपने स्पष्ट और तर्कसंगत निष्कर्ष दर्ज करने के दायित्त्व से मुक्त नहीं हो जाता। शास्ति अधिरोपित करने से पहले वस्तुनिष्ठ विचार आवश्यक है। 

जानबूझकर किये गए आशय के अभाव में: 

  • न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध जानबूझकर किये गए किसी भी कृत्य का कोई प्रमाण दर्ज नहीं किया गया था। जांच रिपोर्ट से यह स्पष्ट हुआ कि क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालयगाजियाबाद में हुई चूकें कर्मचारियों की भारी कमी और अत्यधिक कार्यभार के कारण थींन कि याचिकाकर्त्ता के किसी दुर्भावनापूर्ण या जानबूझकर किये गए कृत्य के कारण। 

पूर्वाग्रह और पूर्वधारणा पर: 

  • न्यायालय ने माना कि दोनों विवादित आदेशों में प्रयुक्त भाषा निष्पक्षता की कमी दर्शाती है और तर्कसंगत निष्कर्षों के बजाय पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत असहमति को प्रतिबिंबित करती है। इससे पूर्वाग्रह के आधार पर निर्णय लेने की उचित आशंका उत्पन्न होती हैजो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। 

अनुतोष के संबंध में: 

  • न्यायालय ने रिट याचिका को मंजूर करते हुए दोनों विवादित शास्ति आदेशों को रद्द कर दिया और अधिकतम आर्थिक शास्ति अधिरोपित करने को मनमाना बताया। 

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 20 क्या है? 

बारे में: 

  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) भारत की संसद द्वारा पारित एक ऐतिहासिक विधान है जो नागरिकों को लोक प्राधिकरणों के पास विद्यमान जानकारी तक पहुँच का अधिकार प्रदान करता है। 
  • यह एक केंद्रीय विधान है जो भारत के प्रत्येक नागरिक को किसी भी लोक प्राधिकरण से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है। 
  • इसका मूल सिद्धांत यह है कि एक जागरूक नागरिक लोकतंत्र के सुचारू संचालन और भ्रष्टाचार को रोकने तथा सरकारों को जवाबदेह ठहराने के लिये आवश्यक है। 

प्रमुख विशेषताएँ: 

  • प्रत्येक नागरिक को लोक प्राधिकरण से जानकारी मांगने का अधिकार हैजिसका उत्तर देना प्राधिकरण के लिये 30 दिनों के भीतर अनिवार्य है। 
  • इसमें कार्यपालिकाविधायिका और न्यायपालिका सहित सभी सांविधानिक प्राधिकरण शामिल हैंसाथ ही सरकार के स्वामित्व वालेनियंत्रित या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित निकाय भी सम्मिलित हैं। 
  • प्रत्येक लोक प्राधिकरण को सूचना का अधिकार अनुरोधों को संभालने के लिये एक लोक सूचना अधिकारी (PIO) नियुक्त करना अनिवार्य है। 
  • दो स्तरीय अपीलीय व्यवस्था विद्यमान है – प्रथम अपील उसी लोक प्राधिकरण के एक वरिष्ठ अधिकारी के समक्ष की जाती हैऔर द्वितीय अपील केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग के समक्ष की जाती है।  

धारा 20 — शास्ति: 

उपधारा (1): मौद्रिक शास्ति 

जहाँ केंद्रीय या राज्य सूचना आयोगकिसी परिवाद या अपील पर निर्णय लेते समयइस राय का हो कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना किसी युक्तोयुक्त कारण के: 

  • सूचना के लिये आवेदन स्वीकार करने से इंकार कर दिया गया; 
  • धारा 7(1) के अधीन विनिर्दिष्ट समय के भीतर सूचना प्रस्तुत करने में विफल; 
  • सूचना के अनुरोध को दुर्भावनापूर्ण ढंग से इंकार कर दिया गया; 
  • जानबूझकर गलतअधूरी या भ्रामक जानकारी देना; 
  • अनुरोध के विषय से संबंधित जानकारी को नष्ट कर दिया गयाया 
  • किसी भी प्रकार से सूचना प्रदान करने में बाधा उत्पन्न करना। 

आवेदन प्राप्त होने या जानकारी उपलब्ध कराए जाने तक प्रति दिन 250 रुपए की शास्ति अधिरोपित की जाएगीजो अधिकतम 25,000 रुपए तक होगी 

दो महत्त्वपूर्ण शर्तें: 

  • प्रथमकिसी भी प्रकार की शास्ति से पहले लोक सूचना अधिकारी (PIO) को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना चाहिये।  
  • द्वितीययह साबित करने का भार कि उसने उचित और लगन से काम कियास्वयं लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर है। 

उपधारा (2): अनुशासनात्मक कार्रवाई  

  • यदि आयोग को यह पता चलता है कि लोक सूचना अधिकारी (PIO) ने बिना किसी युक्तियुक्त कारण के और निरंतर उपरोक्त में से कोई भी व्यतिक्रम किया हैतो वह लोक सूचना अधिकारी के विरुद्ध उस पर लागू सेवा नियमों के अधीन अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश करेगा। 
  • उपधारा (1) से मुख्य अंतर निरंतरता का तत्त्व है - एक एकल या पृथक व्यतिक्रम मौद्रिक शास्ति को आकर्षित कर सकती हैलेकिन बार-बार और निरंतर व्यतिक्रम अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश को आकर्षित करती है। 

सिविल कानून

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 24

 23-Mar-2026

खानदेश एवं अन्य बनाम स्वर्गीय सौ. ताईसाहेब सुनंदा एवं अन्य 

"विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 24, विनिर्दिष्ट पालन के वाद के खारिज हो जाने के बाद संविदा के भंग के लिये प्रतिकर का दावा करने के वादी के अधिकार को वर्जित करती हैकिंतु यह उनके किसी अन्य अनुतोष की मांग करने के अधिकार से वर्जित नहीं करती है जिसके वे ऐसे भंग के कारण हकदार हो सकते हैं।" 

न्यायमूर्ति मेहरोज के. पठान 

स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मेहरोज के. पठान नेखानदेश एवं अन्य बनाम स्वर्गीय सौ. तैसाहेब सुनंदा एवं अन्य (2026)में निर्णय दिया कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 24, विनिर्दिष्ट पालन के लिये दायर वाद के खारिज होने के बाद बयाना राशि की वापसी के लिये एक नया वाद दायर करने से वर्जित नहीं करती है 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि धारा 24 किसी खारिज किये गए विनिर्दिष्ट पालन के वाद के बाद संविदा के भंग के लिये प्रतिकर के दावों को निर्बंधित करती हैयह वादी के अन्य अनुतोषों - जिसमें बयाना राशि की वापसी भी सम्मिलित है - को प्राप्त करने के अधिकार को बरकरार रखती है जो उसी मूल संव्यवहार से उत्पन्न होती हैं। 

खानदेश एवं अन्य बनाम स्वर्गीय सौ. तैसाहेब सुनंदा एवं अन्य (2026)के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • यह विवाद एक सहकारी समिति और एक लोक धर्मार्थ न्यास के बीच अचल संपत्ति के विक्रय के लिये हुए असफल करार को लेकर उत्पन्न हुआ था। 
  • वादी ने भूमि की क्रय के करार के अधीन बयाना राशि के रूप में 2,00,000 रुपए जमा किये 
  • स्वामित्व संबंधी विवादों और बाबूलाल नामक एक तीसरे पक्षकार द्वारा उठाई गई आपत्तियों के कारण यह संव्यवहार पूरा नहीं हो सका। 
  • संव्यवहार असफल होने के बादप्रतिवादियों ने वादियों द्वारा जमा की गई बयाना राशि का समपहरण कर लिया।     
  • वादी पक्ष ने प्रतिवादियों को स्वामित्व संबंधी दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिये एक विधिक नोटिस जारी किया थाप्रतिवादियों ने अनुरोध को अस्वीकार कर दिया और स्पष्ट स्वामित्व प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने में असफल रहे।  
  • प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि चूँकि विनिर्दिष्ट पालन के लिये पूर्व में दायर वाद से कोई अनुतोष नहीं मिला थाइसलिये विधि के अधीन धनवापसी के लिये कोई भी बाद का दावा वर्जित था।  
  • द्वितीय अपील बॉम्बे उच्च न्यायालय में दायर की गई थीजिसमें अधीनस्थ न्यायालयों के एक समान निर्णयों को चुनौती दी गई थीजिन्होंने बयाना राशि वापस करने का निदेश दिया था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

आदेश नियम के अधीन रोक पर: 

  • न्यायालय ने पूर्व की कार्यवाही की परीक्षा की और यह माना कि सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश नियम के अधीन रोक लागू नहीं होती हैक्योंकि पूर्ववर्ती वाद एक भिन्न वाद-हेतुक पर आधारित व्यादेश के लिये थाजबकि वर्तमान वाद संव्यवहार की विफलता के बाद बयाना राशि के समपहरण से उत्पन्न हुआ है - जो एक भिन्न वाद-हेतुक है। 

वादी पक्ष की तत्परता और इच्छाशक्ति के संबंध में 

  • न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि वादी प्रत्येक समय संविदा के अपने दायित्वों के निर्वहन हेतु तत्पर एवं इच्छुक थे। विक्रय विलेख का निष्पादन केवल बाबूलाल द्वारा उठाई गई आपत्ति के कारण संपन्न नहीं हो सका अतः स्पष्ट एवं निर्विवाद स्वामित्व प्रस्तुत करने में विफलता प्रतिवादियों की ही थी। 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 22 के संबंध में: 

  • न्यायालय ने विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 22 का विश्लेषण कियाजिसमें यह उपबंध है कि विनिर्दिष्ट पालन के लिये वाद संस्थित करने वाला वादी संविदा के अधीन भुगतान की गई किसी भी बयाना राशि या जमा राशि की वापसी सहित वैकल्पिक अनुतोषों का भी दावा कर सकता है। 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 24 के संबंध में: 

  • धारा 24 का निर्वचन करते हुए न्यायालय ने माना कि यह उपबंध केवल विनिर्दिष्ट पालन के वाद के खारिज होने के बादसंविदा भंग के लिये प्रतिकरके दावे पर वादी के अधिकार को रोकता है। यह अन्य प्रकार के अनुतोषोंजैसे कि बयाना राशि की वापसीके दावों पर रोक नहीं लगाता हैजिनके लिये वादी उसी भंग के कारण अन्यथा हकदार हो सकता है। 

अनुतोष के संबंध में: 

  • न्यायालय ने द्वितीय अपील खारिज कर दीअधीनस्थ न्यायालयों के एक समान निष्कर्षों को बरकरार रखा और बयाना राशि की वापसी के साथ-साथ 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज की वापसी का निदेश देने वाले आदेश की पुष्टि की। 

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 24 क्या है? 

धारा 24: विनिर्दिष्ट पालन के वाद के खारिज होने के पश्चात् भंग के लिये प्रतिकर के वाद का वर्जन  

धारा 24 एक सरल दो-भाग संरचना पर काम करती है: 

  • यह क्या वर्जित करती है —एक बार संविदा (या उसके किसी भाग) के विनिर्दिष्ट पालन के लिये दायर किया गया वाद खारिज हो जाने परवादीउसी संविदा या उसके भाग केभंग के लिये प्रतिकर का दावा करते हुए नया वाद दायर करने का अधिकार खो देता है। 
  • इससे क्या सुरक्षित रहता है —खारिजी वादी को उसी भंग के कारण मिलने वालेकिसी अन्य अनुतोषके लिये वाद करने से नहीं रोकती है — जैसे कि बयाना राशि की वापसीक्षतिपूर्तिया अन्य न्यायसंगत उपचार 
  • संक्षेप में:धारा 24 प्रतिकर के मामले में दोहरी कार्रवाई को रोकती है — कोई वादी पहले विनिर्दिष्ट पालन के लिये वाद चलाकर उसे अंतिम रूप नहीं दे सकता और फिर उसी भंग के लिये क्षतिपूर्ति का दावा नहीं कर सकता। तथापियह दरवाज़ा पूरी तरह से बंद नहीं करतीप्रत्यास्थापन या अन्य गैर-प्रतिकर संबंधी अनुतोष नए वाद के माध्यम से उपलब्ध रहते हैं।